Thursday, 2 January 2014

​मराठी कविता

ऐक गावाच्या म्हातारे 
अन्यायाच्या छतिवरती 
​हे कविबंधु तू इथे 
​कर वृक्षांची शेती 
​नाही जरी सफेदी 
​संघर्ष साधनेचा 

हिन्दी कविता 


मैं अपना आधार 
मझधारा को बना संगाती 
​परचमे हिंद लेकर 
​टोपी से आदमी को भी 
​कोई आँसू जब